9/13/2014

Guruji Kahan hain

Guruji, Kahan Hain

It has been fifteen years since he took a class in his subject. No, he did not bunk it. In 1998, as block education officer he chose to become a manager as envisaged in the evolving institutional architecture. From a routine school work, he shifted focus on collecting information, disseminating instructions, organizing training, and planning the education development of the block! Sounds interesting!  Alas, the change in course curriculum in 2005-06 has not concerned him as he is very much comfortable in this role that offers freedom in mobility, safety from classroom teaching, and closeness to politics (of running the system).  He is gradually becoming a role model for good number of teachers to bunk the school and become the manager.
Teaching is a noble profession, but it is demanding and accountable as (s)he must face the students. There is no escape route. A teacher in India don’s many hats: besides teaching he conducts all elections (local bodies, parliament and assembly); census, surveys the socio-economic conditions; protocol, and so on. While selecting a teacher, the recruitment agency does not even provide a hint of the tasks awaiting in the field. Within the education sector, the activities have increased manifold because of at least three reasons: first, the expansion of centrally guided school education; second, the change in the orientation of the welfare state; and third, the aspirations of the population. It has led to transfer of resources of various forms at the level of school. This decentralization has not been matched by the evolving democratic institutions which, along with the perceived mistrust in the chain of command, have necessitated the emergence of education managers in large numbers- block education officers, SSA coordinator, RMSA coordinator and so on. There has not been well thought out strategies to man these challenging posts- no expertise.
 Inspection of schools is a specialised job and certainly it is not identical to teaching in a class. This managerial aspect, unfortunately, has not evolved beyond some stereotype training. Poor supervision, monitoring, and intervention are quite evident in the dismal performance of the schools.  Allowing a teacher to get into the shoes of manager without structural improvement in the capacity building of eligible teachers is neither fair for the system nor it does justice to the teacher him(her)self.  Ironically the continuance of current arrangement causes more harm to the dire need of availability of teachers in the school first. Innovative ways of handling the activities of inspection, training, planning must evolve. Use of Information Technology can work as effective tool, but the constraints may not help in connecting the last mile. Alternative approach can be to engage the Deputy Commissioners, who must take the mantle of continuous monitoring of education in the district in structured manner. Goals must be set. Follow up act is often the most difficult task because of poor record management.

Education sector must work to create a system of capable education managers. Their roles are to work as positive facilitators and to act as bridge between the school and the system for better outcome. Sooner it happens better for the education and the teacher!   
(it was published on 5/9/2014 in Arunachal Front newspaper)

5/22/2011

विडम्बना

मुझे तलाश है, उन चौबीस घंटों की, जो सिर्फ मेरे हों.
मै ही निर्धारित करूँ,
कि ब्राम्ह मुहूर्त में कौन सा स्वप्न मुझे दिखे; 
कि किस पक्षी का कलरव मेरे कर्ण को स्पर्श करे;
कि  भास्कर की कौन सी रश्मि मेरे चक्षु युगल को चूमे;
कि कौन सी बांह को अपने मस्तक के ऊपर ले जाते हुए मै एक लम्बी जम्हाई लूं, और
धीरे -धीरे कौन-सी पलक उठाकर इस  उजियारी दुनिया का नया रूप देखूं ;

कि किस करवट अपने घुटनों को मरोड़ते हुए  बिस्तर छोडूँ;
कि दीवार के किस हिस्से में आज एक खिड़की खुले, और
कौन सा पुष्प अपनी सुगंध से मेरे दिलो दिमाग को  सुबासित कर जाए;
कि आज के अखबार में कौन सी खबर पढने के लिए छपे;
कि आज के दिन हर पडोसी बगैर किसी द्वेष और ईर्ष्या के कंपनी बाग़ में सेहत बनाते मिले; 
कि नाश्ते में क्या हो, और उसे ख़त्म करने की रफ़्तार मेरी हो;

कि आज के दिन जब घर से काम पर निकलूँ, तो कोई बच्चा सड़क या दूकान पर ना मिले;
कि कोई किसी मेहनतकश से बदतमीजी ना करे;
 कि किसी भी नुक्कड़ पर कोई भीख ना मांगे; 
कि किसी पैदल राही को सड़क को पहला हक़ मिले; 
कि रास्ते में आने वाले हर हस्पताल में कोई-भी  मरीज जिंदगी की जद्दोजहद का ना मिले;
कि हर सरकारी कार्यालय में कहीं कोई कतार ना बने;

कि शाम को घर लौटते हुए ना कोई शिकन हो ना थकान; 
कि चौखट के भीतर घर के बुजुर्गों से घुलने-मिलने का दौर रहे, और  
तीनों पीढियां बेझिझक, निशंक, सौहार्द भाव से हिले-मिले;
कि बगैर किसी दुस्वप्न के इन सुहाने चौबीस घंटों की एक खुशनुमा चलचित्र  रात की नींद को हल्कि हल्कि थपकी दे जाए.......

विडम्बना देखिये कि साल का हर दिन तो पहले से ही सुपुर्द है, किसी खासमखास शख्सियत के लिए या किसी मकसद के लिए;और
जबतक ऐसा है, वह खुशनुमा चलचित्र एक गुमशुदा ख्वाब है, जिसकी तलाश जारी रहेगी...
इस दिन से उस दिन तक, और इस जन्म से पुनर्जन्म तक...

1/03/2011

मिटटी की खुशबू

अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध की कई महत्वपूर्ण कविताओं में से एक का रसास्वादन आपने पिछले सन्देश में किया होगा. प्रकृति के इन रंगों को शब्दों में पिरोना आज भी प्रासंगिक है. इन खूबियों को जानने के लिए मातृभाषा में गढ़े साहित्य को पढ़ना जरूरी है. डैफोडिल को पढ़ना और भारत के सन्दर्भ में बूझना दो अलग-अलग  बाते हैं. जब तक संयुक्त साम्राज्य (UK ) जाकर डैफोडिल को देखा नहीं, उस पढ़े हुए को असलियत से जोड़ना असंभव था. जानकारी बढ़ाने से कोई परहेज नहीं होना चाहिए. दिन दुनिया की समझ इससे आती है; पर इस क्रम में अपनी मिटटी की खुशबू को भूलना न माफ़ किये जानेवाली गलती है. भारतेंदु की १९ वीं सदी की यह प्रसिद्द कविता सिर्फ आज़ादी के लिए नहीं, बल्कि अपनी विरासत  को संभालने के लिए प्रासंगिक है. 

मातृ-भाषा के प्रति
निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।
बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।।
अंग्रेज़ी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन।
पै निज भाषाज्ञान बिन, रहत हीन के हीन।।

उन्नति पूरी है तबहिं जब घर उन्नति होय।
निज शरीर उन्नति किये, रहत मूढ़ सब कोय।।
निज भाषा उन्नति बिना, कबहुँ न ह्यैहैं सोय।
लाख उपाय अनेक यों भले करो किन कोय।।

इक भाषा इक जीव इक मति सब घर के लोग।
तबै बनत है सबन सों, मिटत मूढ़ता सोग।।
और एक अति लाभ यह, या में प्रगट लखात।
निज भाषा में कीजिए, जो विद्या की बात।।

तेहि सुनि पावै लाभ सब, बात सुनै जो कोय।
यह गुन भाषा और महं, कबहूँ नाहीं होय।।
विविध कला शिक्षा अमित, ज्ञान अनेक प्रकार।
सब देसन से लै करहू, भाषा माहि प्रचार।।

भारत में सब भिन्न अति, ताहीं सों उत्पात।
विविध देस मतहू विविध, भाषा विविध लखात।।
सब मिल तासों छाँड़ि कै, दूजे और उपाय।
उन्नति भाषा की करहु, अहो भ्रातगन आय।।

1/02/2011

हरिऔध

हरिऔध का नाम शायद पुरानी कविताओं के कुछ पन्नों तक सिमट कर रह गया है. हिंदी की यही नियति है, कि इन जैसे तमाम रचनाकारों को विस्मृत कर दें. मुझे नहीं लगता कि हम हिंदी के इन पुरोधाओं को याद भी रख पा रहे हैं. मेरी पीढ़ी तक तो विविध भारती के 'भूले-बिसरे गीत' कार्यक्रम की तरह गाहे-बगाहे इनकी याद आ जाती है, पर आंग्ल भाषा के प्रभाव में बहती नयी पौध के लिए तो अब ये क्विज़ के सवाल भी नहीं हैं. इस छूटती विरासत पर बात करना क्या जरूरी है? मुझे लगता है, यह जरूरी ही नहीं अपितु  अनिवार्य है. 
सबसे पहले यह जानने की कोशिश करते हैं कि इस विरासत का रहना क्यों अनिवार्य है. (१) विरासत एक समुदाय की पहचान होती है. यह कई सभ्यताओं से तराशे जाने के पश्चात् संस्कृति का अविभाज्य अंग बन जाती है. 
(२) विरासत हमारी बौद्धिक क्षमता को भी इंगित करता है. भारतीय कला के प्राचीन अवशेष तत्कालीन उच्च ज्ञान को भी दर्शाता है. 
(३) विरासत लोक ज्ञान की संरक्षक है. यह ज्ञान सदियों से आम जन के अथक प्रयासों का प्रतिफलन है. परंपरागत बुद्धि की खूबियों को ढूँढने की कोशिश में आज का विज्ञान निरंतर चेष्टा कर रहा है. इन खूबियों में उसे भविष्य के विनाश से बचने का रास्ता नजर आ रहा है. 
(४) विरासत आपको वर्तमान की कमजोरियों को दूर करने का मार्ग दिखाता है.
(५) विरासत आपका आत्मविश्वास बढ़ाता है.
(६) विरासत आज के भौतिक वादी दौर में राजस्व अर्जन का प्रचलित जरिया है. 
किसी भी विकसित देश में आप चले जाएँ, विरासत तैयार करने की या उसे भुनाने की होड़ लगी हुई है. इन प्रयत्नों का फायदा वहां की प्रगति में स्पष्ट दीखता है. 
भाषा इस विरासत का सबसे महत्वपूर्ण तत्त्व है. फ्रेंच, जापानी, स्पेनिश, इतालवी, इन सब भाषाओँ को संजोने के प्रयाश तो जग जाहिर हैं. आजकल मैं wales में रहता हूँ, जो बाहर की दुनिया के लिए ब्रिटिश सरकार का हिस्सा है. पर वास्तव में अंग्रेजी यहाँ की मातृभाषा नहीं है. आप cardiff से bangor तक चले जाएँ, अंग्रेजी का दर्ज़ा दूसरा है; वेल्स भाषा को प्रथम स्थान हर जगह पर प्राप्त है. इस भाषा में लिखे साहित्य का संरक्षण और प्रसार वेल्स प्रदेश का एक मुख्य धेय है. 
भाषा सिर्फ बोलचाल का जरिया ही नहीं है, अपितु यह पूरी जीवन शैली है. हमारी विडम्बना है कि पहले हम लोकल से ग्लोबल की ओर जाते हैं फिर ग्लोबल से लोकल की ओर वापस लौटने की कोशिश करते हैं. खतरा इस बात का है कि इस आपाधापी में मातृभाषा अक्सरहां विलुप्त होने लगती है. हिंदी इसी खतरे का शिकार है. लगभग ४२ करोड़ लोगों की यह भाषा मातृभाषा का दर्ज़ा खोने लगी है. जो लोग हिंदी सिनेमा की दुहाई देते नहीं थकते, वही हिंदी साहित्य से अपना मुख मोड़े बैठे हैं. यह आश्चर्य का विषय है कि कामायनी, गोदान या राग दरबारी के पाठक अपने देश में लाख की संख्या में सिमट कर रह गए हैं. किसी नयी रचना की बिक्री हज़ार में हो, तो प्रकाशक धन्य हो जाता है! हिंदी साहित्य पढ़ने वाले विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग तक सीमित होकर रह गए हैं. आधुनिक शिक्षा की इस दुनिया में हिंदी पढ़ना धीरे धीरे इस तरह गायब हो रहा है जैसे गधे के सर से सींग! अस्सी के दशक तक तो शायद गुलशन नंदा, प्रेम वाजपयी,रानू की रचनाओं को घर में सहज प्रवेश मिलता रहा; हिंद पॉकेट बुक्स के सुलभ साहित्य थोड़ी थोड़ी याद दिलाते रहे हिंदी के गद्य को. उदारीकरण की आंधी में पिछले दो दशक में बहुत कुछ बदला है. हर तरफ प्रगति के बिम्ब बिखरे नज़र आते हैं. इन बिम्बों में हिंदी का दर्शन दुर्लभ होता जा रहा है, साहित्य तो लगभग हाशिये पर पहुँच चुका है. 
ऐसे दौर में हरिऔध को याद करना अतीत को जीने जैसा है, पर इनकी रचनाओं को पढ़ना हमेशा से प्रासंगिक रहा है और रहेगा भी, उसी तरह जैसे सुबह का होना, शाम का आना और उसके इर्द-गिर्द जीवन चक्र का निरंतर चलते जाना... एक बानगी खुद देखिये...
    संध्या (प्रिय प्रवास से)
दिवस का अवसान समीप था
गगन था कुछ लोहित हो चला
तरु शिखा पर थी अब राजती
कमलिनी कुल वल्लभ की प्रभा

विपिन बीच विहंगम वृंद का
कल निनाद विवर्धित था हुआ
ध्वनिमयी विविधा विहगावली
उड़ रही नभ मंडल मध्य थी

अधिक और हुई नभ लालिमा
दश दिशा अनुरंजित हो गयी
सकल पादप पुंज हरीतिमा
अरुणिमा विनिमज्जित सी हुई

झलकते पुलिनो पर भी लगी
गगन के तल की वह लालिमा
सरित और सर के जल में पड़ी
अरुणता अति ही रमणीय थी।।

अचल के शिखरों पर जा चढ़ी
किरण पादप शीश विहारिणी
तरणि बिंब तिरोहित हो चला
गगन मंडल मध्य शनै: शनै:।।

ध्वनिमयी करके गिरि कंदरा
कलित कानन केलि निकुंज को
मुरलि एक बजी इस काल ही
तरणिजा तट राजित कुंज में।।

12/16/2010

गुरुदत्त

गुरुदत्त उर्फ़ बसंत कुमार पदुकोने हिंदी सिनेमा के लिए एक पहेली की तरह हैं. उनकी तीन फ़िल्में - प्यासा (१९५७), कागज़ के फूल (१९५९), और साहब बीबी और गुलाम (१९६२)- हमेशा से सिनेप्रेमियों के लिए तीर्थ की तरह हैं. इन श्वेत-श्याम फिल्मों ने भारतीय सिनेमा को वैश्विक पहचान दी है. समय गुजरने के साथ ये और बेहतरीन दिखती हैं. कहानी, पटकथा, गीत-संगीत, अदाकारी, निर्देशन  की बारीकियां, छायांकन, प्रकाश और अन्धकार का संयोजन, और सामाजिक सरोकार, सभी ने इन फिल्मों को classic बनाया है.
पहली दो फिल्मों का निर्देशन गुरुदत्त ने किया और तीसरी का अबरार अल्वी ने.'प्यासा' एवं  'साहब बीबी और गुलाम' को दर्शकों ने काफी सराहा, पर 'कागज़ के फूल' नकार दी गयी. 
'प्यासा' की कहानी चंद्रशेखर प्रेम के उपन्यास पर आधारित है; पर इसकी पटकथा को सशक्त बनाया अबरार की कलम ने. मौकापरस्त ज़माने में कवि की कशमकश और समाज के अनजान, पर रोजमर्रा के चरित्रों का बड़प्पन, इन सबके इर्द-गिर्द घुमती है कहानी. साहिर के गीतों की तल्खियाँ आज इस फिल्म की पहचान सी बन चुकी हैं. 
'कागज़ के फूल' को 'सिटिज़न केन' (१९४१) सी कलात्मक उत्कृष्टता का दर्ज़ा उपलब्ध है. फिल्म के कई दृश्य आज सिनेमा की प्रमुख किताबों (जैसे ऑक्सफोर्ड बुक ऑफ़ सिनेमा) में दर्ज हैं.  कैफ़ी की 'देखी ज़माने की यारी' पूरे समय कहानी में गूंजती रहती है. दोनों फिल्मों में तत्कालीन समाज के दोगलेपन का अंकन  है तो, इन दोनों से दीगर 'साहब, बीबी और गुलाम' सामंती युग के ढहते चरित्र को उकेरता है. यह फिल्म प्रसिद्द उपन्यासकार बिमल मित्र के प्रसिद्द उपन्यास पर आधारित है. 

अगर मैं इन तीनों फिल्मों की खूबियाँ ढूंढूं तो  वो कुछ इस तरह दीखती हैं :
१. साहिर, कैफ़ी और शकील के बेहतरीन गीत 
२. बर्मन दादा और हेमंत कुमार का खूबसूरत संगीत 
३. मूर्ती की लाजवाब सिनेमाटोग्राफी 
४. मीना कुमारी की लरजती आवाज़ 
५. 'साकिया आज मुझे नींद नहीं आएगी' का फिल्मांकन
६. 'जिन्हें नाज़ है हिंद पर'
७. गीता दत्त का दिल को छूनेवाला स्वर    
८. रहमान की  उत्कृष्ट अदाकारी ........... 








     

12/12/2010

वसंत कुमार

३९ वर्ष की जिंदगी वसंत  कुमार  शिवशंकर  पादुकोन ने  इस धरा पर बितायी.१० अक्टूबर १९६४ उसने अपने आप को मुक्त कर दिया. क्यों ? आज भी रहस्य की परतों में छुपा है यह.

इस वसंत कुमार ने लगभग दो दशक हिंदी सिनेमा को दिया. आज ४६ वर्ष के बाद भी ये प्रासंगिक हैं. अमिताभ उनकी एक फिल्म बीस से ज्यादा बार देखने का दावा करते हैं! times की १०० बेहतरीन फिल्मों की लिस्ट में उनकी दो फिल्मों को चुना गया. फिल्मों का हर जानकार उनके कलात्मक निर्देशन की दाद देता है. हर नया निर्देशक उनकी फिल्मों को देखना चाहता है, समझना चाहता है. 

इस बेहतरीन फनकार ने choreographi से अपनी फ़िल्मी जीवन की शुरुआत की, फिर सहायक निर्देशन और अंत में १९५१ में पहला निर्देशन. इसके बाद अगले पांच सालों तक कई सफल फिल्मे दर्शकों तक पहुंची.
साल १९५७. हिंदी सिनेमा के लिए अविस्मर्णीय. शांताराम की 'दो आँखें बारह हाथ', महबूब की 'मदर इण्डिया', बी. र. चोपड़ा की 'नया दौर' दर्शकों और समीक्षकों ने खूब सराही. तीन बेहतरीन निर्देशकों- हृषिकेश (मुसाफिर), नासिर हुसैन (तुमसा नहीं देखा) और विजय आनंद(नौ दो ग्यारह) - ने इस वर्ष पहली बार अपनी फ़िल्में पेश की. 

इतने कलात्मक वर्ष में वसंत कुमार की नयी फिल्म ने एक ऐसी मिसाल रखी, जो आज भी प्रासंगिक है. इस फिल्म के गीतों  का दायरा बंगाल के बॉल संगीत से शुरू होकर खालिस उर्दू शायरी तक जा पहुंचता है. साहिर की उम्दा शायरी और बर्मन दादा की  जमीनी मौशिकी. कहानी का श्रेय अबरार अल्वी को दिया जाता है, जिन्होंने १९६२ में इन्ही वसंत कुमार की एक फिल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ निर्देशन का filmfare पुरस्कार  जीता. 

अब तो आप जान चुके होंगे कि मै किनकी बात कर रहा हूँ!!!     (जारी)    

12/11/2010

तू जिंदा है ...

शैलेन्द्र के गीत सीधे, सरल और सपाट से लगते हैं. न घुमाव है न ही उलझाव. आम हों या खास, आप सबके लिए सुलभ हैं ये गीत. मुझे प्रेमचंद सी सच्चाई दिखती है शैलेन्द्र के गीतों में. प्रेमचंद प्राथमिक कक्षा के बच्चे भी पढ़ते है और स्नातकोत्तर के छात्र भी.

शैलेन्द्र के गीतों का दायरा काफी फैला हुआ है. मौसम, रिश्ते-नाते, जीवन मूल्यों पर लिखे ये गीत सदाबहार हैं. इस सन्देश में मैं उनके फ़िल्मी गीतों का जिक्र नहीं करूंगा. वो फिर कभी!

यहाँ प्रस्तुत है शैलेन्द्र की एक बेजोड़ कृति जिसमे मुर्दों को जगाने की ताकत है. आज़ादी के दौर में लिखी यह रचना पहली बार शायद तीसरी कक्षा में सुनी थी. जोशीली रचनाएं कई सुनी हैं. पर इसकी बात ही कुछ और है. आपकी सहमति पढने के पश्चात् पूछूँगा.

"तू जिंदा है तो ज़िन्दगी की जीत में यकीन कर
अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर. तू जिंदा है ....

ये ग़म के और चार दिन, सितम के और चार दिन,
ये दिन भी जायेंगे गुज़र, गुज़र गए हज़ार दिन.
कभी तो होगी इस चमन पे भी बहार की नज़र,
अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर. तू जिंदा है... 

हमारे कारवां को मंजिलों का इंतज़ार है,
ये आँधियों, ये बिजलियों की पीठ पर सवार है.
तू आ कदम मिला के चल, चलेंगे एक साथ हम,
अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर. तू जिंदा है ...

ज़मीं के पेट में पली अगन, पले हैं ज़लज़ले,
टिके न टिक सकेंगे भूख रोग के स्वराज ये,
मुसीबतों के सर कुचल चलेंगे एक साथ हम,
अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर. तू जिंदा है...
 
बुरी है आग पेट की, बुरे हैं दिल के दाग ये,
न दब सकेंगे, एक दिन बनेंगे इन्कलाब ये,
गिरेंगे ज़ुल्म के महल, बनेंगे फिर नवीन घर,
अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर. तू जिंदा है...  "

(धन्यवाद उनका जिन्होंने इसे वेब पर उपलब्ध करवाया है)

11/28/2010

मुझ से पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब न मांग


  
 फैज़ (१९११-१९८४) की शायरी एक अहसास है जो जिंदगी की जदोजहद से आपको जोडती है. अफ़सोस इनके नगमों की चर्चा भूली बिसरी बात होती जा रही है. जरूरी है कि ये खूबसूरत और दिलों-दिमाग को झकझोरने वाले नगमे हमेशा हमारी दिनचर्या में मौजूद रहें. कई बेहतरीन नगमों में से एक 'मुझसे पहली सी' पेश है. धन्यवाद उनका जिन्होंने इसे साइबर दुनिया में उपलब्ध कराया है.


 मुझ से पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब न मांग
        मैने समझा था कि तू है तो दरख़्शां1 है हयात2
       तेरा ग़म है तो ग़मे-दहर3 का झगड़ा क्या है
       तेरी सूरत से है आलम4 में बहारों को सबात5
       तेरी आँखों के सिवा दुनिया मे रक्खा क्या है
       तू जो मिल जाये तो तक़दीर निगूँ6 हो जाये
       यूँ न था, मैने फ़क़त7 चाहा था यूँ हो जाये

और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा

राहतें8 और भी हैं वस्ल9 की राहत के सिवा
         अनगिनत सदियों से तरीक़ बहीमाना तिलिस्म10
         रेशमो-अतलसो-किमख़्वाब में बुनवाये हुए11
         जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ए-बाज़ार में जिस्म
         ख़ाक में लिथड़े हुए, ख़ून मे नहलाये हुए
         जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों12 से
         पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों13 से

        
        लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे
        अब भी दिलकश14 है तेरा हुस्न मगर क्या कीजे
       और भी दुख हैं ज़माने मे मोहब्बत के सिवा
       राहतें और भी हैं वस्ल15 की राहत के सिवा
 मुझ से पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब न मांग
  1.  प्रकाशमान
  2.  जीवन
  3.  सांसारिक चिंताएँ
  4.  दुनिया
  5.  स्थायित्व
  6.  तक़दीर सिर झुका ले
  7.  केवल
  8.  सुख
  9.  मिलन
  10.  प्राचीन अज्ञानपूर्ण अंधविश्वास रूपी तिलिस्म
  11.  एक प्रकार के कीमती वस्त्र
  12.  शरीर रूपी तंदूर से रोग के कारण निकले हुए
  13.  घाव
  14.  आकर्षक
  15.  मिलन

11/24/2010

जाड़े की धूप

सर्वेश्वर दयाल सक्सेना हिंदी साहित्य के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर रहे हैं. 
मौसम हमारी जीवन संस्कृति से किस कदर जुड़ा है, इसकी एक बानगी सर्वेश्वर 
की इस सरल कविता में झांकें:
  
बहुत दिनों बाद मुझे धूप ने बुलाया

ताते जल नहा पहन श्वेत वसन आयी
खुले लान बैठ गयी दमकती लुनायी
सूरज खरगोश धवल गोद उछल आया।
बहुत दिनों बाद मुझे धूप ने बुलाया।

नभ के उद्यान-छत्र तले मेज : टीला,
पड़ा हरा फूल कढ़ा मेजपोश पीला,
वृक्ष खुली पुस्तक हर पृष्ठ फड़फड़ाया।
बहुत दिनों बाद मुझे धूप ने बुलाया।

पैरों में मखमल की जूती-सी-क्यारी,
मेघ ऊन का गोला बुनती सुकुमारी,
डोलती सलाई हिलता जल लहराया।
बहुत दिनों बाद मुझे धूप ने बुलाया।

बोली कुछ नहीं, एक कुर्सी की खाली,
हाथ बढ़ा छज्जे की साया सरकाली,
बाँह छुड़ा भागा, गिर बर्फ हुई छाया।
बहुत दिनों बाद मुझे धूप ने बुलाया।
                           - सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

11/19/2010

facebook : तकनीक और तृष्णा का घालमेल

तकनीक हमारी जिंदगी को आसान नहीं, बल्कि जटिल बनाता है! इस अकूत सत्य को स्वीकारना कडवे नीम को चबाना सदृश है.आधुनिक मनुष्य नित नयी खोजों के साथ जिंदगी को सहज और सरल बनाने का दावा पेश करता है. बाज़ार इन नयी उत्पत्तियों को मादक चाशनी में लपेट उपभोग का मायाजाल बुनता है. भौंचक आप इस चुम्बकीय डोरी को पकड़ने की कोशिश करते हैं. आपकी तृष्णा-अर्थ, काम या धर्म- अवचेतन से चेतन तक का सफ़र तय करने के लिए जोर मारने लगती है. तकनीक का तृष्णा से गहरा रिश्ता बनता है, शनैः शनैः. इन्हीं तकनीकों में से एक है facebook .

facebook पिछले ६ सालों में एक धूमकेतु की तरह तकनीक की दुनिया का सर्वमान सितारा बन चुका है. लगभग ७०० अरब रुपये के बाज़ार भाव वाली इस तकनीक ने इंसानी गप्पबाज़ी को मोहरा बनाया और बिखरती संवाद विहीन होती दुनिया (हालांकि यह दुनिया आज भी उन तक सीमित है जो समर्थ और सक्षम कहलाते हैं ) को अपने कब्जे में ले लिया है. हर कंप्यूटर साक्षर मनुष्य इससे प्रभावित है. हर कोई मित्र है और मित्रता की नयी परिभाषा गढ़ी जा रही है.  आप किसी को भी नेवता दे सकते हैं, मित्र बनने का या बनाने का. एक क्लिक और मित्र की गिनती बढ़ जाती है. धीरे धीरे एक ऐसा समूह (समाज नहीं) तैयार हो जाता है, जहाँ  रिश्तों की मर्यादा के मायने बदल रहे हैं. पुरानी यादें ताज़ा तो होती हैं, पर भूले बिसरे घाव भी उभरने लगते हैं. संवाद की नयी ईमारत, जिसकी नीव पर प्रश्नचिन्ह लगा है, खड़ी हो जाती है, जो बाहर से अत्यंत आकर्षक और मनमोहक नज़र आती है. इस दुनिया में आप अपने आपको सुरक्षित और भरोसेमंद पाते हैं. आप अपनी क़द्र और अहमियत यहाँ तलाशते हैं. पर अन्दर से आप जानते हैं, कि ऐसा नहीं है. यहाँ ज्यादा लोग हैं, मित्र नहीं! इस नए समूह का चरित्र भरोसे वाला तो कदापि नहीं है. किस तरह और कब  आपकी जिंदगी के बेहद  अपने भाव आम में बदल जाते  हैं, आप जान भी नहीं पाते. आप अपनी जिंदगी के सबसे बड़े सच 'स्व' को धीरे धीरे तिरोहित कर देते हैं  अपने नए मित्रों के सहयोग से आपको आभाष भी नहीं होता.

यह नयी दुनिया है. तकनीक की तृष्णा से घुली मिली दुनिया. यहाँ हर सम्बन्ध एक सा है, वगैर किसी तह का. वास्तविक जिंदगी से, जहाँ हर सम्बन्ध अनूठा और जुदा है,  ये काफी अलग है.  आप वसुधैव कुटुम्बकम के तिलस्म में धीरे धीरे खोते जा रहे हैं. इसका हश्र क्या होगा? एक पुरानी सूक्ति याद आ रही है, जो मुझे इससे जुडी दिखती है :
      facebook 'स चरित्रं, मनुष्यश भाग्यम,
      देवो ना जानाति कुतो मनुष्यः!      

7/15/2010

हवा बदलिए (दो)

(आगे) 
आधुनिक इंसान को अगर कोई समस्या सुलझाने के लिए कहा जाए तो वह या तो प्रतिउत्पनमतित्व का रास्ता अपनाएगा या जय हो गूगल महाराज का जय घोष कर निदान लाएगा. धनेसर पुरातन था, आजादी के पहले सांस ली, आँखें खोली और रोया भी .. आधुनिक होने की पहली शर्त है.. स्वतंत्र भूमि में जन्म लेना. पर धनेसर के बप्पा ने कुछ जल्दी कर दी क्योंकि चर्चिल के चुनाव में हारने की खबर  और  एटली के इरादे उन तक पहुँच नहीं पाए थे.. खैर अब गड़े मुर्दे उखाड़ने से क्या फायदा ..


पुरातन इंसान को समस्या सुलझाने में वक्त लगता है.. जैसे बकौल गुलेरी 'मृत्यु के कुछ समय पहले स्मृति बहुत साफ़ हो जाती है..', वैसे ही यह इंसान अपने बीते दिनों की तह में जाता है, आज के सवाल का हल खोजने.. 


अब  धनेसर को क्या मालूम कि जलवायु परिवर्तन का तूफ़ान तो खासा ताज़ा है.. हज़ारो सूरमा वैज्ञानिकों की मशक्कत और मिहनत से हम समझ पा रहे हैं कि  हिमालय पिघल रहा है ..समंदर में पानी बढ़ रहा है और प्रलय आने वाला है.. वैसे ये और बात है कि दुनिया में इसकी जंग भी छिड़ी हुई है कि 'क्या ये सच है या सच का पहाड़' .. पर इतना तो सच है कि इस ताजे तूफ़ान से कई लोगों का चूल्हा जल रहा है, कई रोटियां सेक पा रहे हैं..और ब्रेकिंग  न्यूज़ के रास्ते हर समय उधम मचा रहे हैं.. धनेसर इन सबसे परे अपने पोते के लिए कुछ तलाश रहा था ...


खिलावनपुर के उस प्राथमिक स्कूल में, जहाँ पांचवी तक पढ़ा था, पछिया और पुरवा दोनों के झोंके धनेसर को  झकजोर जाते थे. खिड़की और दरवाजे से सर्र सर्र हवा बहती थी. गुरूजी तब मास्साब नहीं बने थे, 'सर का तमगा' कब लगा इसपर अनुसन्धान होना बाकी है . बड़े अच्छे गुरूजी थे. क्या चांटे पड़ते थे सबक याद न करने पर..डर के मारे पेशाब निकल जाता था ...पर धनेसर बच जाता था सबक याद कर ... और आज के समय, उसने सुना कि पीटना तो दूर डांटना भी मुश्किल था स्कूल में ..कभी कभी वो घबरा जाता था पोते को लेकर, पता नहीं सबक याद करता भी है या नहीं. पर अंग्रेजी स्कूल में शायद ऐसा ही होता हो... 


सो खिलावनपुर के उस प्राथमिक स्कूल में एक पाठ था.. जलवायु और हम... अकेले गुरूजी सब कुछ पढ़ाते थे.. धनेसर को आज भी याद है... प्रलय आया तो दुनिया बनी ... (पुनश्च )  
      

7/09/2010

suryaast aberystwyth march

हवा बदलिए (एक)

कान पक गए हैं, अब तो ढकोसला सा लगने लगा है यह सब - climate change हो रहा है, कुछ कीजिये, वर्ना गए काम से !जैसे कोई पका आम है जो अब टपकने वाला है. जलवायु परिवर्तन - इसमें नया क्या है ? बोलचाल की भाषा में - हवा बदल रही है. अरे भाई, हवा का तो काम ही है बदलना. वायु देवता की मर्जी है, हमारी जुर्रत की हम दखल दें ...


एक जमाना था, जब हवा बदलने के लिए लोग नैनीताल, मसूरी, शिमला, कसौली, दार्जीलिंग का रूख करते थे. तीन वर्ग के लोग अक्सरहां  ऐसा कर पाते थे - बीमार, धनाढ्य और सरफिरे. उन दिनों, लाइलाज बीमारियाँ अक्सरहां जवान महिलायों (शादी की उम्र वाली लड़कियों पर गौर फरमाएं ) को पकड़ लेती थीं, और डॉक्टर की सलाह होती, किसी पहाड़ पर ले जाईये, हवा बदलने की जरूरत है! मुझे इसकी जानकारी यशपाल और सोबती से मिली. जी नहीं, वे मेरे पड़ोस में कभी नहीं रहे, पर रात के खाने के बाद हुई गुफ्तगुं में कई बार इसका जिक्र हुआ; और मै उन पन्नों पर कई बार रूका. गुलशन नंदा, रानू और प्रेम बाजपयी तो कितनो को हवा बदलने में मदद  कर चुके हैं. साठ और सत्तर के दशक में यह कितना सुलभ था. कभी कभी बॉलीवुड (मौसम याद है ना) भी इसमें मदद करता था; तब सरकारी साक्षरता का जमाना नहीं था और जरूरत  भी नहीं थी, इसलिए तीन घंटे के लिए सभी हवा बदल सकते थे ...ख्यालों में .. धनाढ्य तो गौरांग महाप्रभुओं की लीक पर चलते चलते पहाड़ की सैर कर लेते थे.. गर्मी के लिए चमड़ी पतली पड़ जाती थी, बेटियां ज्यादा नाजुक होती थीं और उम्मीद होती थी कि 'ऐसे में कहीं कोई मिल जाए'... भद्रलोक तो दार्जीलिंग में बन्दर टोपी में बंद, ठिठुरता फुचके  की तलाश में माल पर भटकता नजर आता था.. कि रोकम ठंडा...


लेखक सरफिरे होते हैं ..आजकल पता नहीं..हमारे जमाने में तो होते थे..ठन्डे की तलाश उनको भी होती थी.. बैसाख ख़तम हुआ और जेठ की दुपहरी कलम छीन लेती थी उनसे.. भैया खाना खा सकते हो.. कुल्ला  कर सकते हो.. गप्पें मार सकते हो.. वगैरह वगैरह .. पर कलम उठाने की लिए हवा बदलने की जरूरत है..धूमिल सा पहलवान तो हैं नहीं कि पछिया बर्दाश्त कर लेंगे ...तो चल दिए कलम कॉपी लेकर पहाड़ की ओर...
जी, अब ज्यादा फैला हुआ जनतंत्र है, सो सबको हवा बदलने की जरूरत है. कुछ सरकार करेगी, कुछ आप भी कीजिये...कुछ नहीं, तो हवा बदलने की जुगाली ही सही...


६५ साला धनेसर को उसका पोता बता रहा था ...climate change हो रहा है.. इसे बदलने की लिए मुझे पेंटिंग बनानी है..international पुरस्कार मिल सकता है..कुछ आईडिया दो न ग्रैंड पा... पोते ने मतलब भी समझाया, पर बालक हिंदी में थोडा तंग था..(अंग्रेजी स्कूल की नवीं कक्षा में हिंदी की जानकारी होना घोर पाप है )..धनेसर पढ़ा लिखा था, पर पुराने ज़माने का. आठवीं पास. एक भार्गव का शब्दकोष, यदा कदा, पोते की अंग्रेजी को उसकी भाषा में बदल  देता था..  थोडा थोडा समझ में आया. जलवायु और परिवर्तन. यानि कि हवा बदलना.. धनेसर थोडा उलझन में पड़ गया.. यह कौन सी नयी बात है.. भाई यह तो रीत है प्रकृति की.. चैत और बैशाख के बाद जेठ आसाढ़ की गर्मी तो पड़ेगी ही, तभी तो सावन भादो में सब हरा हरा होयेगा. फिर बाबा तुलसी तो कबके कह गए .. 'वर्षा विगत शरद ऋतू आई, फुले कास सकल माहि छाई'..आशिन-कार्तिक तो त्यौहार लाता है, फिर अगहन की रब्बी और   पूष की रात का अपना मजा है..माघ स्नान और  फागुन के चटक रंग..यही तो आनंद है जलवायु बदलने का.. कोई बीमार थोड़े ही हैं की हवा बर्दाश्त नहीं होगी. बेकार की बात है....पर पोते को टालना मुश्किल था .. इसलिए कुछ सुझाना जरूरी था.... (पुनश्च ) 

12/15/2009

गाँधी विलियम शिरेर की नज़र में

विलियम शिरेर chicago ट्रिबुने का पत्रकार था, और उसने दूसरे विश्व युद्ध पर प्रसिद्ध रिपोर्ताज लिखी। 'तीसरे रिच (REICH) का उत्थान और पतन' उसकी प्रसिद्ध रचना है। दूसरे विश्व युद्ध के पूर्व वह भारत भी आया था , एक पत्रकार के रूप में । १९७९ में, भारत छोड़ने के ४८ वर्ष बाद , उसने 'गाँधी : एक संस्मरण' प्रकाशित की। पिछले ३० वर्षों में यह किताब मुझे पहली बार अबेर य्स्त्वय्थ विश्वविद्यालय (वेल्स) के पुस्तकालय में मिली। किसी 'सुंदर कबाड़ी' (१८९८-१९८३) के व्यक्तिगत संग्रह से दान में दी गई! (हमारे यहाँ दान में dene और लेने की परम्परा विश्वविद्यालयों में है या नहीं?)
२४५ पन्नों की इस किताब में १५ अध्याय हैं। अगर आपने गांधी फ़िल्म देखी है, तो बहुत सारी समानताएं तथ्यों के रूप में मिल जायेगी। पर किताब पढ़ने का अपना आनंद है। नमक सत्याग्रह के बाद शिरेर भारत आया, एक अद्वुत आन्दोलन का सही ब्यौरा विश्व, खासकर अमेरिका, के सामने प्रस्तुत करने।
पूरी किताब में गाँधी एक तिलस्म की तरह नज़र आते हैं। एक ऐसा तिलस्म, जो बेहद मायावी, पर बेहतरीन है। काटने-मारने पर उतारू इस दुनिया में एक सुकून की तरह! गज़ब का आत्म विश्वास, आम आदमी पर मजबूत पकड़ , अत्यन्त सुलझा हुआ और लक्ष्य पर पार्थ सी नज़र! शिरेर की किताब एक आइना है, आन्दोलन की पेचीदिगियों में झांकने का। पूरी किताब में अटूट धैर्य की मिसाल के रूप में गाँधी दिखते हैं। बारीक से बारीक जानकारी रखना, तार्किक कौशल, श्रोता की मनःस्थिति पर अद्वुत पकड़, बगैर उत्तेजित हुए अपनी बात धीरे-धीरे पर मजबूती से रखने की कला, गाँधी को उम्दा कुतनितिग्यबनाती। गाँधी-इरविन और गाँधी-वेलिंग्टन वार्तालापों के बीच शिमला का बेहतरीन वर्णन औपनिवेशिक दुनिया के नए आयाम खोलती है।
एक पूरा अध्याय मार्च १९२२ के प्रसिद्ध कोर्ट दृश्य पर है, जहाँ गाँधी अपने आपको दोषी मानते हैं, पर कारणों का लेखा-जोखा देते हुए जज को नैतिक कारणों से इस्तीफा देने की सलाह देते हैं ; जज अभिभूत होता है, और उन्हें तिलक सी सजा देता है। ऐसे कई दृश्य पूरी किताब में हैं जो आपको वशीभूत करते हैं। ब्रिटेन में गाँधी भ्रमण और तत्कालीन अखबारों - times, observer, sunday express - की मानसिकता का चित्रण आपको मिल जाएगा इसमे.
यह किताब एक इतिहासकार ने नहीं, बल्कि एक पत्रकार, जो ब्रिटिश या भारतीय नहीं है, ने लिखी है. पठनीय है, पूरी तरह.

अगर आप इतिहास के उस दौर को महसूस करना चाहते हैं, जिसने आज का भारत बनाया है, तो इसे पढ़ना अनिवार्य है...

12/08/2009

दूर देश में

देश क्या है?

एक भौगोलिक परिमिति, एक राजनैतिक विचारधारा, एक सांस्कृतिक अवधारणा, एक आर्थिक बाँध, या बस एक जूनून !

अपना देश, अपना राष्ट्र, अपना..अपना..

क्या लगभग चार हज़ार वर्ष पूर्व, हरप्पा-मोहन्जोदारो-कालीबंगन-धोल्विरा सभ्यता के समय भी देश रहा होग़ा!लिपि तो हम पढ़ नहीं पाये अब तक, इसलिए अनुमान पर ही इस बेमिसाल सभ्यता की रूपरेखा बनाते आए हैं। नगरी सभ्यता, जो व्यापार में परिपक्व थी, अपने समकालीन सभ्यताओं से जुड़ी थी। इस सभ्यता को जीवन मिलता था चारों ओर से घिरे कृषक गांवों से ! तो क्या यह देश था? यहाँ बसने वाले लोग क्या किसी एक विचारधारा से जुड़े से थे? क्या सभी एक सा क़ानून या नियम का पालन करते थे? क्या मुद्दे उन्हें जोड़ते थे? खुदाई में मिली चीज़ों से यह ताना-बाना बुनने की कोशिश की गई है की यह सभ्यता पूरे भोगोलिक क्षेत्र में लगभग एक समान थी! पर उनका जीवन दर्शन क्या था? समाज और समुदाय की क्या विशिष्टताएं थीं? देश की कोई परिकल्पना थी या नहीं? उत्तर अभी भी कई पहेलियों में लिपटा है, अब तक !
आर्यावर्त हमारी सांस्कृतिक अवधारणा का सर्वोत्कृष्ट द्योतक रहा है अब तक! निस्संदेह आर्यावर्त आर्य समुदाय से जुड़ा है। आर्य कौन? काल को लेकर मतभेद जारी है? कोई कहता है कि बाहर से आए, तो कोई इसे इस भोगोलिक क्षेत्र (उत्तर भारत) का ही निवासी बताते हैं। चाहे जो भी हो , इसमे कोई संदेह नहीं कि आर्य शब्द अब हिंदू मानस के पटल पर पूर्णतया अंकित है। किसी भी धार्मिक या सांस्कृतिक अनुष्ठान में अत्यन्त सहजता और सरलता से इसका प्रयोग होता है। सभी आर्य संताने हैं और इसलिए आर्यावर्त निवासी! आपसी भेदभाव से परे,हिंदू धर्म के सभी पालकों के लिए आर्यावर्त एक चिरंतन सत्य है। यह भौगोलिक परिसीमा से परे मानसिक जुड़ाव है।
अगर ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखें, तो रामायण कि पंक्ति याद आती है :
जननी जन्मभूमि श्च स्वर्गादपि गरीयसी, ना मी अपि स्वर्णमयी लंका लक्ष्मण।
नेपाल के राष्ट्रीय चिन्ह में पहला हिस्सा आज मौजूद है । विद्यालय के निबंधों में काफी इस्तेमाल इस सूक्ति का हुआ है।
गौर तलब है कि अपनी जन्मभूमि दूसरे से बेहतर है, यह विचार तब भी था और आज भी है! पर यह जन्मभूमि कहाँ से कहाँ तक है, यह मुद्दे का विषय है।
आज के संदार्व में राष्ट्र क्या है? पाश्चात्य विचार के अनुसार इसके द्योतक हैं- एक संविधान, एक ध्वज, एक गीत, एक भाषा, एक मुहर, एक नोट। आज़ाद भारत में भी यह सब है। पर इतना ही नहीं, इससे काफी आगे भी है। २९ भाषाएँ १० लाख(प्रत्येक) से ज्यादा लोग बोलते हैं; १२२ भाषाएँ दस हज़ार(प्रत्येक) से ज्यादा! २००० से अधिक सामुदायिक वर्ग हैं। हिंदू, मुस्लिम, सिख, जैन, बौद्ध सरीखे धर्म मौजूद हैं। होली, दीपावली, ईद, क्रिसमस, दुर्गापूजा, पोंगल, ओणम, वैसाखी, -- सभी त्यौहार मानते हैं। क्रिकेट और हिन्दी फिल्मों का बोलबाला है। जोड़ते हैं देश को यह।
पर क्या यह सर्वोपरि है- स्व से, परिवार से, विरादरी से, जातीयता से, भाषाई समरूपता से? अगर युद्ध न हो, खेल बंद हों, फिल्मों का प्रदर्शन रुका हो, तब भी क्या राष्ट्र हम विद्यालय कि पुस्तकों से बाहर ढूंढ पायेंगे? तेलंगाना, मराठवाडा, गोरखालैंड क्या हमारे लिए ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं? विगत सालों में ऐसा कई बार हुआ है, और हमें शर्मिंदगी उठानी पड़ी है। कहीं भारतीयता पाश्चात्य राष्ट्रवाद की परिभाषा में सिमट तो नही रही
अगर ऐसा है तो नए मानक गढ़ने चाहिए, और अगर कोई मानक वर्तमान में राष्ट्र कि अवधारणा में योगदान देता है, तो उसे भरपूर बढावा देना चाहिए- पर, kaise ? आप भी सोचें, मैं भी जुगाली करता हूँ .........

2/14/2009

वैलेंटाइन दिवस के बहाने

वैलेंटाइन दिवस की उहा-poh पोह,

पिछले एक हफ्ते से ब्रेकिंग न्यूज़ के रूप में मुतालिक और उनकी सेना के विचारों से मध्यवर्गीय मानस को आक्रांत किया जा रहा था- वैलेंटाइन दिवस और भारतीय प्यार का द्वंद्व। प्यार का खुल्लमखुल्ला प्रदर्शन, नहीं... प्यार करना है तो बेडरूम में जाओ! खुल्लमखुल्ला प्रदर्शन करना है तो पहले एक चुटकी सिन्दूर डलवा लो... वाह रे भारतीय संस्कृति!

संस्कृति के खतरे और उन्हें निर्धारित करने वाले ये ठेकेदार...

एक फ़िल्म, american history x, देखने का मौका मिला था, जो neo-नाज़ी विचारधारा अमेरिका में लाना चाहते हैं . वर्ण व्यवस्था और उसके द्वंद्व का सहज परन्तु कारुणिक चित्रण है, इसमे. हम भी तो इससे जूझ रहे हैं... अलग अलग स्तर पर, अलग अलग मुद्दों से..

क्या है हमारी संस्कृति? कोई जड़ या कोई स्थिर अवस्था? किस विचारधारा का हम पालन करते हैं और किसे हम फलते-फूलते देखना चाहते हैं..

क्या हमारी संस्कृति किसी valentine  दिवस की फूँक से उड़ जायेगी, या इससे और मजबूत होगी..

2/01/2009

बसंत पंचमी के बहाने

बसंत पंचमी!


कितने वर्ष बीत गए, जब माँ सरस्वती की आराधना का दिवस धूमधाम से मनाया करता था


लगभग एक महीने की तैयारी के बाद इस दिन वीणा वादिनी की प्रतिमा के समक्ष हम सभी विद्यार्थी पूरी श्रद्धा के साथ नत मस्तक हो निराला की पंक्तियाँ गाते थे--


वर दे वीणा वादिनी वर दे,


प्रिय स्वतंत्र रव, अमृत मंत्र नव,


भारत में भर दे...


संस्कृति से जुडाव का, विद्यालय स्तर पर इससे बेहतर और कोई आयोजन मुझे नज़र नहीं आता था...


बीते वर्षों में बहुत कुछ यहाँ बदला है। क्या यह बदलाव समाज में बदलते मूल्यों का बदलाव नहीं है! क्या हमें नए मानक गढ़ने चाहिए इन मूल्यों को परखने के लिए! नए समाज का नया मानक होना ही चाहिए। कोई भी मानक चिर स्थायी नहीं हो सकता। गति प्रकृति का नियम है, यह एक सतत प्रक्रिया है। परन्तु क्या हमने नए मानक गढ़ने के सही प्रयास किए हैं? क्या हममे क्षमता है, नए मानक गढ़ने की? यह दायित्व हम सबका है...

1/25/2009

गणतंत्र

एक और गणतंत्र आ गया; गण का तंत्र!

अख़बार की कतरनें और दूरदर्शन की नौजवान वाचिकाएं चीखती और चिल्लाती हैं, हर रोज -- किस गण के लिए है तंत्र! सब कुछ ग़लत है, सभी बेईमान हैं, कोई भविष्य नहीं है, आम आदमी (जैसे कि ये जानते हैं कि आम का मतलब क्या है?) पीड़ित है, सरकारी अफसर निकम्मे और स्वार्थी हैं --अजीब सी कोसने कि होड़ लगी है!

मै मूक दर्शक और पाठक बना हर रोज यह कड़वा घूँट निगलने की कोशिश करता हूँ; यह सोचकर की आज कुछ ऐसा करुँ जिससे कोई तो कहे--यह तेरा, मेरा, सबका बनाया हुआ तंत्र है। हर सुबह थोडी-सी खुशी लेकर लोगों में बांटने कि ईमानदार कोशिश होती है! यह अहसास पूरे समय दिन भर बना रहता है- आओ, थोडी-सी खुशी जिंदगी में मुझसे भी ले लो! जिंदगी इतनी बुरी भी नहीं है, न ही हम सबका बनाया यह तंत्र!

उम्मीद बांटता हूँ मैं, कर लो थोड़ा यकीन

गणतंत्र की किरण चूमेगी फिर जमीन

हलकी उर्जा, थोडी चमक , खुशी महीन

आओ मिलकर बटोरें, छितराएं नहीं..

1/18/2009

इधर उधर की बातें

कई दिन से जिंदगी की आपाधापी में इधर उधर की बातें करने की इच्छा पनप रही थी!
जिंदगी की आपाधापी में कब सुबह होती है या शाम, होश नहीं रहता! हर कोई इतना व्यस्त है कि अपने अन्दर झांकने का वक्त ही नहीं मिलता।
इधर उधर, आस पड़ोस और ख़ुद छूटता जा रहा है, शनैः-शनैः...
क्यों न कुछ इधर उधर कि बातें हों, जिसमे थोड़ा आस पड़ोस हो और बहुत ज्यादा ख़ुद...

देखें, वक्त के साए में इधर उधर जिंदगी कि गर्मी में कितनी छाँव ढूंढ पाता है...
जिंदगी हर वक्त साँस लेती है , इधर-उधर
दूर इससे हम, ढूँढते हैं सुकून ...