9/13/2014
Guruji Kahan hain
5/22/2011
विडम्बना
1/03/2011
मिटटी की खुशबू
मातृ-भाषा के प्रति
बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।।
पै निज भाषाज्ञान बिन, रहत हीन के हीन।।
निज शरीर उन्नति किये, रहत मूढ़ सब कोय।।
लाख उपाय अनेक यों भले करो किन कोय।।
तबै बनत है सबन सों, मिटत मूढ़ता सोग।।
निज भाषा में कीजिए, जो विद्या की बात।।
यह गुन भाषा और महं, कबहूँ नाहीं होय।।
सब देसन से लै करहू, भाषा माहि प्रचार।।
विविध देस मतहू विविध, भाषा विविध लखात।।
उन्नति भाषा की करहु, अहो भ्रातगन आय।।
1/02/2011
हरिऔध
सबसे पहले यह जानने की कोशिश करते हैं कि इस विरासत का रहना क्यों अनिवार्य है. (१) विरासत एक समुदाय की पहचान होती है. यह कई सभ्यताओं से तराशे जाने के पश्चात् संस्कृति का अविभाज्य अंग बन जाती है.
(२) विरासत हमारी बौद्धिक क्षमता को भी इंगित करता है. भारतीय कला के प्राचीन अवशेष तत्कालीन उच्च ज्ञान को भी दर्शाता है.
(३) विरासत लोक ज्ञान की संरक्षक है. यह ज्ञान सदियों से आम जन के अथक प्रयासों का प्रतिफलन है. परंपरागत बुद्धि की खूबियों को ढूँढने की कोशिश में आज का विज्ञान निरंतर चेष्टा कर रहा है. इन खूबियों में उसे भविष्य के विनाश से बचने का रास्ता नजर आ रहा है.
(४) विरासत आपको वर्तमान की कमजोरियों को दूर करने का मार्ग दिखाता है.
(५) विरासत आपका आत्मविश्वास बढ़ाता है.
(६) विरासत आज के भौतिक वादी दौर में राजस्व अर्जन का प्रचलित जरिया है.
किसी भी विकसित देश में आप चले जाएँ, विरासत तैयार करने की या उसे भुनाने की होड़ लगी हुई है. इन प्रयत्नों का फायदा वहां की प्रगति में स्पष्ट दीखता है.
भाषा इस विरासत का सबसे महत्वपूर्ण तत्त्व है. फ्रेंच, जापानी, स्पेनिश, इतालवी, इन सब भाषाओँ को संजोने के प्रयाश तो जग जाहिर हैं. आजकल मैं wales में रहता हूँ, जो बाहर की दुनिया के लिए ब्रिटिश सरकार का हिस्सा है. पर वास्तव में अंग्रेजी यहाँ की मातृभाषा नहीं है. आप cardiff से bangor तक चले जाएँ, अंग्रेजी का दर्ज़ा दूसरा है; वेल्स भाषा को प्रथम स्थान हर जगह पर प्राप्त है. इस भाषा में लिखे साहित्य का संरक्षण और प्रसार वेल्स प्रदेश का एक मुख्य धेय है.
भाषा सिर्फ बोलचाल का जरिया ही नहीं है, अपितु यह पूरी जीवन शैली है. हमारी विडम्बना है कि पहले हम लोकल से ग्लोबल की ओर जाते हैं फिर ग्लोबल से लोकल की ओर वापस लौटने की कोशिश करते हैं. खतरा इस बात का है कि इस आपाधापी में मातृभाषा अक्सरहां विलुप्त होने लगती है. हिंदी इसी खतरे का शिकार है. लगभग ४२ करोड़ लोगों की यह भाषा मातृभाषा का दर्ज़ा खोने लगी है. जो लोग हिंदी सिनेमा की दुहाई देते नहीं थकते, वही हिंदी साहित्य से अपना मुख मोड़े बैठे हैं. यह आश्चर्य का विषय है कि कामायनी, गोदान या राग दरबारी के पाठक अपने देश में लाख की संख्या में सिमट कर रह गए हैं. किसी नयी रचना की बिक्री हज़ार में हो, तो प्रकाशक धन्य हो जाता है! हिंदी साहित्य पढ़ने वाले विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग तक सीमित होकर रह गए हैं. आधुनिक शिक्षा की इस दुनिया में हिंदी पढ़ना धीरे धीरे इस तरह गायब हो रहा है जैसे गधे के सर से सींग! अस्सी के दशक तक तो शायद गुलशन नंदा, प्रेम वाजपयी,रानू की रचनाओं को घर में सहज प्रवेश मिलता रहा; हिंद पॉकेट बुक्स के सुलभ साहित्य थोड़ी थोड़ी याद दिलाते रहे हिंदी के गद्य को. उदारीकरण की आंधी में पिछले दो दशक में बहुत कुछ बदला है. हर तरफ प्रगति के बिम्ब बिखरे नज़र आते हैं. इन बिम्बों में हिंदी का दर्शन दुर्लभ होता जा रहा है, साहित्य तो लगभग हाशिये पर पहुँच चुका है.
ऐसे दौर में हरिऔध को याद करना अतीत को जीने जैसा है, पर इनकी रचनाओं को पढ़ना हमेशा से प्रासंगिक रहा है और रहेगा भी, उसी तरह जैसे सुबह का होना, शाम का आना और उसके इर्द-गिर्द जीवन चक्र का निरंतर चलते जाना... एक बानगी खुद देखिये...
संध्या (प्रिय प्रवास से)
गगन था कुछ लोहित हो चला
तरु शिखा पर थी अब राजती
कमलिनी कुल वल्लभ की प्रभा
विपिन बीच विहंगम वृंद का
कल निनाद विवर्धित था हुआ
ध्वनिमयी विविधा विहगावली
उड़ रही नभ मंडल मध्य थी
अधिक और हुई नभ लालिमा
दश दिशा अनुरंजित हो गयी
सकल पादप पुंज हरीतिमा
अरुणिमा विनिमज्जित सी हुई
झलकते पुलिनो पर भी लगी
गगन के तल की वह लालिमा
सरित और सर के जल में पड़ी
अरुणता अति ही रमणीय थी।।
किरण पादप शीश विहारिणी
तरणि बिंब तिरोहित हो चला
गगन मंडल मध्य शनै: शनै:।।
कलित कानन केलि निकुंज को
मुरलि एक बजी इस काल ही
तरणिजा तट राजित कुंज में।।
12/16/2010
गुरुदत्त
12/12/2010
वसंत कुमार
इस वसंत कुमार ने लगभग दो दशक हिंदी सिनेमा को दिया. आज ४६ वर्ष के बाद भी ये प्रासंगिक हैं. अमिताभ उनकी एक फिल्म बीस से ज्यादा बार देखने का दावा करते हैं! times की १०० बेहतरीन फिल्मों की लिस्ट में उनकी दो फिल्मों को चुना गया. फिल्मों का हर जानकार उनके कलात्मक निर्देशन की दाद देता है. हर नया निर्देशक उनकी फिल्मों को देखना चाहता है, समझना चाहता है.
इस बेहतरीन फनकार ने choreographi से अपनी फ़िल्मी जीवन की शुरुआत की, फिर सहायक निर्देशन और अंत में १९५१ में पहला निर्देशन. इसके बाद अगले पांच सालों तक कई सफल फिल्मे दर्शकों तक पहुंची.
साल १९५७. हिंदी सिनेमा के लिए अविस्मर्णीय. शांताराम की 'दो आँखें बारह हाथ', महबूब की 'मदर इण्डिया', बी. र. चोपड़ा की 'नया दौर' दर्शकों और समीक्षकों ने खूब सराही. तीन बेहतरीन निर्देशकों- हृषिकेश (मुसाफिर), नासिर हुसैन (तुमसा नहीं देखा) और विजय आनंद(नौ दो ग्यारह) - ने इस वर्ष पहली बार अपनी फ़िल्में पेश की.
इतने कलात्मक वर्ष में वसंत कुमार की नयी फिल्म ने एक ऐसी मिसाल रखी, जो आज भी प्रासंगिक है. इस फिल्म के गीतों का दायरा बंगाल के बॉल संगीत से शुरू होकर खालिस उर्दू शायरी तक जा पहुंचता है. साहिर की उम्दा शायरी और बर्मन दादा की जमीनी मौशिकी. कहानी का श्रेय अबरार अल्वी को दिया जाता है, जिन्होंने १९६२ में इन्ही वसंत कुमार की एक फिल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ निर्देशन का filmfare पुरस्कार जीता.
अब तो आप जान चुके होंगे कि मै किनकी बात कर रहा हूँ!!! (जारी)
12/11/2010
तू जिंदा है ...
शैलेन्द्र के गीतों का दायरा काफी फैला हुआ है. मौसम, रिश्ते-नाते, जीवन मूल्यों पर लिखे ये गीत सदाबहार हैं. इस सन्देश में मैं उनके फ़िल्मी गीतों का जिक्र नहीं करूंगा. वो फिर कभी!
यहाँ प्रस्तुत है शैलेन्द्र की एक बेजोड़ कृति जिसमे मुर्दों को जगाने की ताकत है. आज़ादी के दौर में लिखी यह रचना पहली बार शायद तीसरी कक्षा में सुनी थी. जोशीली रचनाएं कई सुनी हैं. पर इसकी बात ही कुछ और है. आपकी सहमति पढने के पश्चात् पूछूँगा.
अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर. तू जिंदा है ....
ये दिन भी जायेंगे गुज़र, गुज़र गए हज़ार दिन.
कभी तो होगी इस चमन पे भी बहार की नज़र,
अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर. तू जिंदा है...
ये आँधियों, ये बिजलियों की पीठ पर सवार है.
तू आ कदम मिला के चल, चलेंगे एक साथ हम,
अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर. तू जिंदा है ...
टिके न टिक सकेंगे भूख रोग के स्वराज ये,
मुसीबतों के सर कुचल चलेंगे एक साथ हम,
अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर. तू जिंदा है...
न दब सकेंगे, एक दिन बनेंगे इन्कलाब ये,
गिरेंगे ज़ुल्म के महल, बनेंगे फिर नवीन घर,
अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर. तू जिंदा है... "
(धन्यवाद उनका जिन्होंने इसे वेब पर उपलब्ध करवाया है)
11/28/2010
मुझ से पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब न मांग
फैज़ (१९११-१९८४) की शायरी एक अहसास है जो जिंदगी की जदोजहद से आपको जोडती है. अफ़सोस इनके नगमों की चर्चा भूली बिसरी बात होती जा रही है. जरूरी है कि ये खूबसूरत और दिलों-दिमाग को झकझोरने वाले नगमे हमेशा हमारी दिनचर्या में मौजूद रहें. कई बेहतरीन नगमों में से एक 'मुझसे पहली सी' पेश है. धन्यवाद उनका जिन्होंने इसे साइबर दुनिया में उपलब्ध कराया है.
मुझ से पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब न मांग
मैने समझा था कि तू है तो दरख़्शां1 है हयात2
तेरा ग़म है तो ग़मे-दहर3 का झगड़ा क्या है
तेरी सूरत से है आलम4 में बहारों को सबात5
तेरी आँखों के सिवा दुनिया मे रक्खा क्या है
तू जो मिल जाये तो तक़दीर निगूँ6 हो जाये
यूँ न था, मैने फ़क़त7 चाहा था यूँ हो जाये
और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
राहतें8 और भी हैं वस्ल9 की राहत के सिवा
अनगिनत सदियों से तरीक़ बहीमाना तिलिस्म10
रेशमो-अतलसो-किमख़्वाब में बुनवाये हुए11
जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ए-बाज़ार में जिस्म
ख़ाक में लिथड़े हुए, ख़ून मे नहलाये हुए
जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों12 से
पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों13 से
लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे
अब भी दिलकश14 है तेरा हुस्न मगर क्या कीजे
और भी दुख हैं ज़माने मे मोहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल15 की राहत के सिवा
मुझ से पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब न मांग
- प्रकाशमान
- जीवन
- सांसारिक चिंताएँ
- दुनिया
- स्थायित्व
- तक़दीर सिर झुका ले
- केवल
- सुख
- मिलन
- प्राचीन अज्ञानपूर्ण अंधविश्वास रूपी तिलिस्म
- एक प्रकार के कीमती वस्त्र
- शरीर रूपी तंदूर से रोग के कारण निकले हुए
- घाव
- आकर्षक
- मिलन
11/24/2010
जाड़े की धूप
मौसम हमारी जीवन संस्कृति से किस कदर जुड़ा है, इसकी एक बानगी सर्वेश्वर
की इस सरल कविता में झांकें:
बहुत दिनों बाद मुझे धूप ने बुलाया
खुले लान बैठ गयी दमकती लुनायी
सूरज खरगोश धवल गोद उछल आया।
बहुत दिनों बाद मुझे धूप ने बुलाया।
पड़ा हरा फूल कढ़ा मेजपोश पीला,
वृक्ष खुली पुस्तक हर पृष्ठ फड़फड़ाया।
बहुत दिनों बाद मुझे धूप ने बुलाया।
मेघ ऊन का गोला बुनती सुकुमारी,
डोलती सलाई हिलता जल लहराया।
बहुत दिनों बाद मुझे धूप ने बुलाया।
हाथ बढ़ा छज्जे की साया सरकाली,
बाँह छुड़ा भागा, गिर बर्फ हुई छाया।
बहुत दिनों बाद मुझे धूप ने बुलाया।
11/19/2010
facebook : तकनीक और तृष्णा का घालमेल
facebook 'स चरित्रं, मनुष्यश भाग्यम,
देवो ना जानाति कुतो मनुष्यः!
7/15/2010
हवा बदलिए (दो)
आधुनिक इंसान को अगर कोई समस्या सुलझाने के लिए कहा जाए तो वह या तो प्रतिउत्पनमतित्व का रास्ता अपनाएगा या जय हो गूगल महाराज का जय घोष कर निदान लाएगा. धनेसर पुरातन था, आजादी के पहले सांस ली, आँखें खोली और रोया भी .. आधुनिक होने की पहली शर्त है.. स्वतंत्र भूमि में जन्म लेना. पर धनेसर के बप्पा ने कुछ जल्दी कर दी क्योंकि चर्चिल के चुनाव में हारने की खबर और एटली के इरादे उन तक पहुँच नहीं पाए थे.. खैर अब गड़े मुर्दे उखाड़ने से क्या फायदा ..
पुरातन इंसान को समस्या सुलझाने में वक्त लगता है.. जैसे बकौल गुलेरी 'मृत्यु के कुछ समय पहले स्मृति बहुत साफ़ हो जाती है..', वैसे ही यह इंसान अपने बीते दिनों की तह में जाता है, आज के सवाल का हल खोजने..
अब धनेसर को क्या मालूम कि जलवायु परिवर्तन का तूफ़ान तो खासा ताज़ा है.. हज़ारो सूरमा वैज्ञानिकों की मशक्कत और मिहनत से हम समझ पा रहे हैं कि हिमालय पिघल रहा है ..समंदर में पानी बढ़ रहा है और प्रलय आने वाला है.. वैसे ये और बात है कि दुनिया में इसकी जंग भी छिड़ी हुई है कि 'क्या ये सच है या सच का पहाड़' .. पर इतना तो सच है कि इस ताजे तूफ़ान से कई लोगों का चूल्हा जल रहा है, कई रोटियां सेक पा रहे हैं..और ब्रेकिंग न्यूज़ के रास्ते हर समय उधम मचा रहे हैं.. धनेसर इन सबसे परे अपने पोते के लिए कुछ तलाश रहा था ...
खिलावनपुर के उस प्राथमिक स्कूल में, जहाँ पांचवी तक पढ़ा था, पछिया और पुरवा दोनों के झोंके धनेसर को झकजोर जाते थे. खिड़की और दरवाजे से सर्र सर्र हवा बहती थी. गुरूजी तब मास्साब नहीं बने थे, 'सर का तमगा' कब लगा इसपर अनुसन्धान होना बाकी है . बड़े अच्छे गुरूजी थे. क्या चांटे पड़ते थे सबक याद न करने पर..डर के मारे पेशाब निकल जाता था ...पर धनेसर बच जाता था सबक याद कर ... और आज के समय, उसने सुना कि पीटना तो दूर डांटना भी मुश्किल था स्कूल में ..कभी कभी वो घबरा जाता था पोते को लेकर, पता नहीं सबक याद करता भी है या नहीं. पर अंग्रेजी स्कूल में शायद ऐसा ही होता हो...
सो खिलावनपुर के उस प्राथमिक स्कूल में एक पाठ था.. जलवायु और हम... अकेले गुरूजी सब कुछ पढ़ाते थे.. धनेसर को आज भी याद है... प्रलय आया तो दुनिया बनी ... (पुनश्च )
7/09/2010
हवा बदलिए (एक)
एक जमाना था, जब हवा बदलने के लिए लोग नैनीताल, मसूरी, शिमला, कसौली, दार्जीलिंग का रूख करते थे. तीन वर्ग के लोग अक्सरहां ऐसा कर पाते थे - बीमार, धनाढ्य और सरफिरे. उन दिनों, लाइलाज बीमारियाँ अक्सरहां जवान महिलायों (शादी की उम्र वाली लड़कियों पर गौर फरमाएं ) को पकड़ लेती थीं, और डॉक्टर की सलाह होती, किसी पहाड़ पर ले जाईये, हवा बदलने की जरूरत है! मुझे इसकी जानकारी यशपाल और सोबती से मिली. जी नहीं, वे मेरे पड़ोस में कभी नहीं रहे, पर रात के खाने के बाद हुई गुफ्तगुं में कई बार इसका जिक्र हुआ; और मै उन पन्नों पर कई बार रूका. गुलशन नंदा, रानू और प्रेम बाजपयी तो कितनो को हवा बदलने में मदद कर चुके हैं. साठ और सत्तर के दशक में यह कितना सुलभ था. कभी कभी बॉलीवुड (मौसम याद है ना) भी इसमें मदद करता था; तब सरकारी साक्षरता का जमाना नहीं था और जरूरत भी नहीं थी, इसलिए तीन घंटे के लिए सभी हवा बदल सकते थे ...ख्यालों में .. धनाढ्य तो गौरांग महाप्रभुओं की लीक पर चलते चलते पहाड़ की सैर कर लेते थे.. गर्मी के लिए चमड़ी पतली पड़ जाती थी, बेटियां ज्यादा नाजुक होती थीं और उम्मीद होती थी कि 'ऐसे में कहीं कोई मिल जाए'... भद्रलोक तो दार्जीलिंग में बन्दर टोपी में बंद, ठिठुरता फुचके की तलाश में माल पर भटकता नजर आता था.. कि रोकम ठंडा...
लेखक सरफिरे होते हैं ..आजकल पता नहीं..हमारे जमाने में तो होते थे..ठन्डे की तलाश उनको भी होती थी.. बैसाख ख़तम हुआ और जेठ की दुपहरी कलम छीन लेती थी उनसे.. भैया खाना खा सकते हो.. कुल्ला कर सकते हो.. गप्पें मार सकते हो.. वगैरह वगैरह .. पर कलम उठाने की लिए हवा बदलने की जरूरत है..धूमिल सा पहलवान तो हैं नहीं कि पछिया बर्दाश्त कर लेंगे ...तो चल दिए कलम कॉपी लेकर पहाड़ की ओर...
जी, अब ज्यादा फैला हुआ जनतंत्र है, सो सबको हवा बदलने की जरूरत है. कुछ सरकार करेगी, कुछ आप भी कीजिये...कुछ नहीं, तो हवा बदलने की जुगाली ही सही...
६५ साला धनेसर को उसका पोता बता रहा था ...climate change हो रहा है.. इसे बदलने की लिए मुझे पेंटिंग बनानी है..international पुरस्कार मिल सकता है..कुछ आईडिया दो न ग्रैंड पा... पोते ने मतलब भी समझाया, पर बालक हिंदी में थोडा तंग था..(अंग्रेजी स्कूल की नवीं कक्षा में हिंदी की जानकारी होना घोर पाप है )..धनेसर पढ़ा लिखा था, पर पुराने ज़माने का. आठवीं पास. एक भार्गव का शब्दकोष, यदा कदा, पोते की अंग्रेजी को उसकी भाषा में बदल देता था.. थोडा थोडा समझ में आया. जलवायु और परिवर्तन. यानि कि हवा बदलना.. धनेसर थोडा उलझन में पड़ गया.. यह कौन सी नयी बात है.. भाई यह तो रीत है प्रकृति की.. चैत और बैशाख के बाद जेठ आसाढ़ की गर्मी तो पड़ेगी ही, तभी तो सावन भादो में सब हरा हरा होयेगा. फिर बाबा तुलसी तो कबके कह गए .. 'वर्षा विगत शरद ऋतू आई, फुले कास सकल माहि छाई'..आशिन-कार्तिक तो त्यौहार लाता है, फिर अगहन की रब्बी और पूष की रात का अपना मजा है..माघ स्नान और फागुन के चटक रंग..यही तो आनंद है जलवायु बदलने का.. कोई बीमार थोड़े ही हैं की हवा बर्दाश्त नहीं होगी. बेकार की बात है....पर पोते को टालना मुश्किल था .. इसलिए कुछ सुझाना जरूरी था.... (पुनश्च )
12/15/2009
गाँधी विलियम शिरेर की नज़र में
२४५ पन्नों की इस किताब में १५ अध्याय हैं। अगर आपने गांधी फ़िल्म देखी है, तो बहुत सारी समानताएं तथ्यों के रूप में मिल जायेगी। पर किताब पढ़ने का अपना आनंद है। नमक सत्याग्रह के बाद शिरेर भारत आया, एक अद्वुत आन्दोलन का सही ब्यौरा विश्व, खासकर अमेरिका, के सामने प्रस्तुत करने।
पूरी किताब में गाँधी एक तिलस्म की तरह नज़र आते हैं। एक ऐसा तिलस्म, जो बेहद मायावी, पर बेहतरीन है। काटने-मारने पर उतारू इस दुनिया में एक सुकून की तरह! गज़ब का आत्म विश्वास, आम आदमी पर मजबूत पकड़ , अत्यन्त सुलझा हुआ और लक्ष्य पर पार्थ सी नज़र! शिरेर की किताब एक आइना है, आन्दोलन की पेचीदिगियों में झांकने का। पूरी किताब में अटूट धैर्य की मिसाल के रूप में गाँधी दिखते हैं। बारीक से बारीक जानकारी रखना, तार्किक कौशल, श्रोता की मनःस्थिति पर अद्वुत पकड़, बगैर उत्तेजित हुए अपनी बात धीरे-धीरे पर मजबूती से रखने की कला, गाँधी को उम्दा कुतनितिग्यबनाती। गाँधी-इरविन और गाँधी-वेलिंग्टन वार्तालापों के बीच शिमला का बेहतरीन वर्णन औपनिवेशिक दुनिया के नए आयाम खोलती है।
एक पूरा अध्याय मार्च १९२२ के प्रसिद्ध कोर्ट दृश्य पर है, जहाँ गाँधी अपने आपको दोषी मानते हैं, पर कारणों का लेखा-जोखा देते हुए जज को नैतिक कारणों से इस्तीफा देने की सलाह देते हैं ; जज अभिभूत होता है, और उन्हें तिलक सी सजा देता है। ऐसे कई दृश्य पूरी किताब में हैं जो आपको वशीभूत करते हैं। ब्रिटेन में गाँधी भ्रमण और तत्कालीन अखबारों - times, observer, sunday express - की मानसिकता का चित्रण आपको मिल जाएगा इसमे.
यह किताब एक इतिहासकार ने नहीं, बल्कि एक पत्रकार, जो ब्रिटिश या भारतीय नहीं है, ने लिखी है. पठनीय है, पूरी तरह.
अगर आप इतिहास के उस दौर को महसूस करना चाहते हैं, जिसने आज का भारत बनाया है, तो इसे पढ़ना अनिवार्य है...
12/08/2009
दूर देश में
एक भौगोलिक परिमिति, एक राजनैतिक विचारधारा, एक सांस्कृतिक अवधारणा, एक आर्थिक बाँध, या बस एक जूनून !
अपना देश, अपना राष्ट्र, अपना..अपना..
क्या लगभग चार हज़ार वर्ष पूर्व, हरप्पा-मोहन्जोदारो-कालीबंगन-धोल्विरा सभ्यता के समय भी देश रहा होग़ा!लिपि तो हम पढ़ नहीं पाये अब तक, इसलिए अनुमान पर ही इस बेमिसाल सभ्यता की रूपरेखा बनाते आए हैं। नगरी सभ्यता, जो व्यापार में परिपक्व थी, अपने समकालीन सभ्यताओं से जुड़ी थी। इस सभ्यता को जीवन मिलता था चारों ओर से घिरे कृषक गांवों से ! तो क्या यह देश था? यहाँ बसने वाले लोग क्या किसी एक विचारधारा से जुड़े से थे? क्या सभी एक सा क़ानून या नियम का पालन करते थे? क्या मुद्दे उन्हें जोड़ते थे? खुदाई में मिली चीज़ों से यह ताना-बाना बुनने की कोशिश की गई है की यह सभ्यता पूरे भोगोलिक क्षेत्र में लगभग एक समान थी! पर उनका जीवन दर्शन क्या था? समाज और समुदाय की क्या विशिष्टताएं थीं? देश की कोई परिकल्पना थी या नहीं? उत्तर अभी भी कई पहेलियों में लिपटा है, अब तक !
आर्यावर्त हमारी सांस्कृतिक अवधारणा का सर्वोत्कृष्ट द्योतक रहा है अब तक! निस्संदेह आर्यावर्त आर्य समुदाय से जुड़ा है। आर्य कौन? काल को लेकर मतभेद जारी है? कोई कहता है कि बाहर से आए, तो कोई इसे इस भोगोलिक क्षेत्र (उत्तर भारत) का ही निवासी बताते हैं। चाहे जो भी हो , इसमे कोई संदेह नहीं कि आर्य शब्द अब हिंदू मानस के पटल पर पूर्णतया अंकित है। किसी भी धार्मिक या सांस्कृतिक अनुष्ठान में अत्यन्त सहजता और सरलता से इसका प्रयोग होता है। सभी आर्य संताने हैं और इसलिए आर्यावर्त निवासी! आपसी भेदभाव से परे,हिंदू धर्म के सभी पालकों के लिए आर्यावर्त एक चिरंतन सत्य है। यह भौगोलिक परिसीमा से परे मानसिक जुड़ाव है।
अगर ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखें, तो रामायण कि पंक्ति याद आती है :
जननी जन्मभूमि श्च स्वर्गादपि गरीयसी, ना मी अपि स्वर्णमयी लंका लक्ष्मण।
नेपाल के राष्ट्रीय चिन्ह में पहला हिस्सा आज मौजूद है । विद्यालय के निबंधों में काफी इस्तेमाल इस सूक्ति का हुआ है।
गौर तलब है कि अपनी जन्मभूमि दूसरे से बेहतर है, यह विचार तब भी था और आज भी है! पर यह जन्मभूमि कहाँ से कहाँ तक है, यह मुद्दे का विषय है।
आज के संदार्व में राष्ट्र क्या है? पाश्चात्य विचार के अनुसार इसके द्योतक हैं- एक संविधान, एक ध्वज, एक गीत, एक भाषा, एक मुहर, एक नोट। आज़ाद भारत में भी यह सब है। पर इतना ही नहीं, इससे काफी आगे भी है। २९ भाषाएँ १० लाख(प्रत्येक) से ज्यादा लोग बोलते हैं; १२२ भाषाएँ दस हज़ार(प्रत्येक) से ज्यादा! २००० से अधिक सामुदायिक वर्ग हैं। हिंदू, मुस्लिम, सिख, जैन, बौद्ध सरीखे धर्म मौजूद हैं। होली, दीपावली, ईद, क्रिसमस, दुर्गापूजा, पोंगल, ओणम, वैसाखी, -- सभी त्यौहार मानते हैं। क्रिकेट और हिन्दी फिल्मों का बोलबाला है। जोड़ते हैं देश को यह।
पर क्या यह सर्वोपरि है- स्व से, परिवार से, विरादरी से, जातीयता से, भाषाई समरूपता से? अगर युद्ध न हो, खेल बंद हों, फिल्मों का प्रदर्शन रुका हो, तब भी क्या राष्ट्र हम विद्यालय कि पुस्तकों से बाहर ढूंढ पायेंगे? तेलंगाना, मराठवाडा, गोरखालैंड क्या हमारे लिए ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं? विगत सालों में ऐसा कई बार हुआ है, और हमें शर्मिंदगी उठानी पड़ी है। कहीं भारतीयता पाश्चात्य राष्ट्रवाद की परिभाषा में सिमट तो नही रही
अगर ऐसा है तो नए मानक गढ़ने चाहिए, और अगर कोई मानक वर्तमान में राष्ट्र कि अवधारणा में योगदान देता है, तो उसे भरपूर बढावा देना चाहिए- पर, kaise ? आप भी सोचें, मैं भी जुगाली करता हूँ .........
2/14/2009
वैलेंटाइन दिवस के बहाने
पिछले एक हफ्ते से ब्रेकिंग न्यूज़ के रूप में मुतालिक और उनकी सेना के विचारों से मध्यवर्गीय मानस को आक्रांत किया जा रहा था- वैलेंटाइन दिवस और भारतीय प्यार का द्वंद्व। प्यार का खुल्लमखुल्ला प्रदर्शन, नहीं... प्यार करना है तो बेडरूम में जाओ! खुल्लमखुल्ला प्रदर्शन करना है तो पहले एक चुटकी सिन्दूर डलवा लो... वाह रे भारतीय संस्कृति!
संस्कृति के खतरे और उन्हें निर्धारित करने वाले ये ठेकेदार...
एक फ़िल्म, american history x, देखने का मौका मिला था, जो neo-नाज़ी विचारधारा अमेरिका में लाना चाहते हैं . वर्ण व्यवस्था और उसके द्वंद्व का सहज परन्तु कारुणिक चित्रण है, इसमे. हम भी तो इससे जूझ रहे हैं... अलग अलग स्तर पर, अलग अलग मुद्दों से..
क्या है हमारी संस्कृति? कोई जड़ या कोई स्थिर अवस्था? किस विचारधारा का हम पालन करते हैं और किसे हम फलते-फूलते देखना चाहते हैं..
क्या हमारी संस्कृति किसी valentine दिवस की फूँक से उड़ जायेगी, या इससे और मजबूत होगी..
2/01/2009
बसंत पंचमी के बहाने
बसंत पंचमी!
कितने वर्ष बीत गए, जब माँ सरस्वती की आराधना का दिवस धूमधाम से मनाया करता था
लगभग एक महीने की तैयारी के बाद इस दिन वीणा वादिनी की प्रतिमा के समक्ष हम सभी विद्यार्थी पूरी श्रद्धा के साथ नत मस्तक हो निराला की पंक्तियाँ गाते थे--
वर दे वीणा वादिनी वर दे,
प्रिय स्वतंत्र रव, अमृत मंत्र नव,
भारत में भर दे...
संस्कृति से जुडाव का, विद्यालय स्तर पर इससे बेहतर और कोई आयोजन मुझे नज़र नहीं आता था...
बीते वर्षों में बहुत कुछ यहाँ बदला है। क्या यह बदलाव समाज में बदलते मूल्यों का बदलाव नहीं है! क्या हमें नए मानक गढ़ने चाहिए इन मूल्यों को परखने के लिए! नए समाज का नया मानक होना ही चाहिए। कोई भी मानक चिर स्थायी नहीं हो सकता। गति प्रकृति का नियम है, यह एक सतत प्रक्रिया है। परन्तु क्या हमने नए मानक गढ़ने के सही प्रयास किए हैं? क्या हममे क्षमता है, नए मानक गढ़ने की? यह दायित्व हम सबका है...
1/25/2009
गणतंत्र
एक और गणतंत्र आ गया; गण का तंत्र!
अख़बार की कतरनें और दूरदर्शन की नौजवान वाचिकाएं चीखती और चिल्लाती हैं, हर रोज -- किस गण के लिए है तंत्र! सब कुछ ग़लत है, सभी बेईमान हैं, कोई भविष्य नहीं है, आम आदमी (जैसे कि ये जानते हैं कि आम का मतलब क्या है?) पीड़ित है, सरकारी अफसर निकम्मे और स्वार्थी हैं --अजीब सी कोसने कि होड़ लगी है!
मै मूक दर्शक और पाठक बना हर रोज यह कड़वा घूँट निगलने की कोशिश करता हूँ; यह सोचकर की आज कुछ ऐसा करुँ जिससे कोई तो कहे--यह तेरा, मेरा, सबका बनाया हुआ तंत्र है। हर सुबह थोडी-सी खुशी लेकर लोगों में बांटने कि ईमानदार कोशिश होती है! यह अहसास पूरे समय दिन भर बना रहता है- आओ, थोडी-सी खुशी जिंदगी में मुझसे भी ले लो! जिंदगी इतनी बुरी भी नहीं है, न ही हम सबका बनाया यह तंत्र!
उम्मीद बांटता हूँ मैं, कर लो थोड़ा यकीन
गणतंत्र की किरण चूमेगी फिर जमीन
हलकी उर्जा, थोडी चमक , खुशी महीन
आओ मिलकर बटोरें, छितराएं नहीं..
1/18/2009
कई दिन से जिंदगी की आपाधापी में इधर उधर की बातें करने की इच्छा पनप रही थी!
जिंदगी की आपाधापी में कब सुबह होती है या शाम, होश नहीं रहता! हर कोई इतना व्यस्त है कि अपने अन्दर झांकने का वक्त ही नहीं मिलता।
इधर उधर, आस पड़ोस और ख़ुद छूटता जा रहा है, शनैः-शनैः...
क्यों न कुछ इधर उधर कि बातें हों, जिसमे थोड़ा आस पड़ोस हो और बहुत ज्यादा ख़ुद...
देखें, वक्त के साए में इधर उधर जिंदगी कि गर्मी में कितनी छाँव ढूंढ पाता है...
जिंदगी हर वक्त साँस लेती है , इधर-उधर
दूर इससे हम, ढूँढते हैं सुकून ...
